Skip to main content

असमंजस


मेरी एक आँख में अभी नींद सोयी है
और दूसरी आँख उठना चाहती है
सुगबुगाई है एक आँखों में उठने की आकांछा
और दूसरे आँख में अकर्ष भर रहा है

ये सोने वाली आँख क्रोधित है
उसे पता है दूसरी आँख ही जीतेगी
फिर भी हांथों का सहारा ले कर
बंद करवा रही है वो अपने सहचर को

जगने वाली आँख मन के साथ
साँठ गांठ बना रेही है,
सुबह की लालिमा से सारी ऊर्जा लेकर
नभ से आगे जाना चाहती है

शायद दोनों आंखो को पता है
क्या करना है क्या पाना है
फिर भी दिनचर्या है उनका
एक को सोना है
एक को कुच्छ कर जाना है


Comments

Post a Comment