वो निकल पड़ा था भोर से
धुल धूसरित मजदूर
दिन भर बोया खेत वो
हुआ थक कर चूर
जल रही है तपती धरती
बारिश वाली आग
मेघा प्रियतम के बिना
निराधार सब राग
चितित निर्बल नदी
जैसे रेट की सेज
आँचल में जल नहीं
इस पीड़ा से लबरेज
काश बरखा आ जाये
ये थी मजदूर की तान
शायद इस बार फिर
बच जाये प्राण
Comments
Post a Comment