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धूल


कल  ही  तक  जो 
पैरों  के  नीचे  थी 
जीवन  को   तलाशती 
धूल
जाग   गयी  है 
वो  आज 
पाकर  हवा  का  स्पर्श 
उठ  गयी  है 
धरती  से  आसमान  तक 
फैला  लिया  है
 उसने   अपना  संसार 
बंद  हो  गयी 
हैं  घूरती 
आँखें 
उसका  सामना  करने 
के  डर से 

Comments

  1. wah mere gulzar! loved it.
    nice that ur poetry is back...keep writing.
    chayawaad!

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